
जय और वन्दना की अनकही कहानी – भाग 1
ड्यूटी खत्म करके मैं कुंडली से रात करीब 11 बजे घर लौट रहा था। जैसे ही अलीपुर बाईपास के पास पहुँचा, सड़क के किनारे एक गाड़ी खड़ी दिखाई दी। रात का समय था और इलाका काफ़ी सुनसान। मैंने अपनी बाइक धीरे की और देखा कि गाड़ी के पास एक स्त्री खड़ी है।
मैंने पास जाकर पूछा—“मैडम, क्या हुआ? कोई दिक़्क़त है क्या?”
वो बोलीं—“शायद गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया है।”
आसपास पेट्रोल पंप नहीं था। मैंने कहा—“इतनी रात को यहाँ से गुज़रने वाला कोई मददगार मिलना मुश्किल है। अगर मैं मदद कर सकूँ तो बताइये।”
वो बोलीं—“नहीं, आप जाइये। मैं किसी और से मदद ले लूँगी।” लेकिन मुझे लगा कि इतनी देर रात, सुनसान जगह पर, किसी महिला का अकेले रुकना सुरक्षित नहीं है।
मैंने समझाया—“मैडम, यहाँ सिवा ट्रकों के और कोई नहीं निकलता। बेहतर होगा आप इंतज़ार न करें। पास में पंप नहीं है, लेकिन अगर आपके पास खाली बोतल हो, तो मैं अपनी बाइक से थोड़ा पेट्रोल निकालकर आपकी गाड़ी में डाल सकता हूँ।”
वो कुछ पल चुप रहीं, फिर मुस्कराकर बोलीं—“गाड़ी में एक खाली पानी की बोतल है।” उन्होंने मुझे बोतल पकड़ा दी।
मैंने तुरंत बाइक के नीचे से पाइप निकाला और पेट्रोल निकालकर बोतल भरने लगा। मुझे पास खड़े देख वो बोलीं—“मैंने सोचा था आप पंप से पेट्रोल लेने जाएंगे, इसी वजह से मना किया था। सॉरी।”
मैंने कहा—“कोई बात नहीं, इंसान इंसान के ही काम आता है।”
मैंने बोतल का पेट्रोल गाड़ी के टैंक में डाला। इतने में हम दोनों की बातचीत शुरू हुई। उन्होंने अपना नाम बताया—वन्दना। मैंने भी अपना नाम बताया। हम बातें करते-करते नज़दीक खड़े हो गए। तभी मैंने महसूस किया कि उनके मुँह से शराब की हल्की महक आ रही थी।
मैंने पूछा—“वन्दना जी, आपने ड्रिंक की है क्या?”
वो थोड़ी झेंपकर बोलीं—“नहीं, बस शादी में दोस्तों ने ज़िद की तो थोड़ी ले ली थी।”
घड़ी देखी तो रात के 12 बज चुके थे। मैंने कहा—“वन्दना जी, अब देर हो रही है। चलिए, आप घर जाइये और मैं भी निकलता हूँ।”
उन्होंने जाने से पहले मुझे पैसे देने चाहे, लेकिन मैंने मना कर दिया। फिर अचानक पूछ बैठीं—“जय, आपके घर पर कौन रहता है?”
मैंने कहा—“अभी तो मैं अकेला ही हूँ।”
उन्होंने कहा—“मैं रोहिणी में रहती हूँ, पति ज़्यादातर काम के लिए बाहर रहते हैं।”
फिर वन्दना ने मेरा फ़ोन नंबर माँगा। मैंने पहले हिचकिचाया, लेकिन फिर दे दिया। वापस रास्ते में हम दोनों ने एक-दूसरे को अलविदा कहा।
अगला दिन आया। सुबह क़रीब दस बजे उनका फ़ोन आया।
“जय, कहाँ हो तुम?”
मैंने कहा—“घर पर।”
“आज मिल सकते हो?”
मैंने टालते हुए कहा—“आज नहीं, फिर कभी।”
लेकिन वो ज़िद करने लगीं—“नहीं, आज ही आओ। मेरे घर मिलो।”
मैंने बहुत समझाया, पर उन्होंने लगभग मनवाकर कहा—“नहीं जय, आज आना ही पड़ेगा।”
आख़िरकार मैंने हामी भर दी। उन्होंने रोहिणी का पता दिया। कुछ देर दफ़्तर का छोटा काम निपटाकर मैं उनके घर पहुँचा।
घंटी बजाते ही दरवाज़े से वन्दना बाहर आईं। मुस्कुराईं और बोलीं—“आओ, इंतज़ार कर रही थी।”
अन्दर आकर उन्होंने पानी पिलाया। बातचीत शुरू हुई। अचानक वो गंभीर स्वर में बोलीं—“जय, मैं अपने पति के साथ बहुत अकेलापन महसूस करती हूँ। उनका ध्यान हमेशा काम में रहता है। मैं खुश नहीं हूँ।”
मैंने चुपचाप उनकी बातें सुनीं। कभी-कभी इंसान सिर्फ़ किसी की सुनने वाली कान चाहता है। मुझे लगा जैसे वन्दना ने पहली बार बिना डर अपने अकेलेपन का इज़हार किया हो।
फिर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा—“कल रात तो तुमने मदद की, इसलिए आज मन हुआ तुम्हें बुलाऊँ। थोड़ा समय साथ गुज़ारेंगे तो अच्छा लगेगा।”
बातचीत धीरे-धीरे सहज होती गई। वन्दना चाय बनाने गईं और साथ ही बोलीं—“डिनर की भी तैयारी कर रखी है, आज आराम से बातें करेंगे।”
मैंने देखा, उस छोटी-सी मुलाकात में हमने दोस्ती का नया आधार पा लिया था। मुझे समझ आया कि कभी-कभी अनजाने पल रिश्तों की ऐसी शुरुआत कर देते हैं जिसकी कल्पना भी नहीं होती।
रात धीरे-धीरे ढल रही थी। हमने साथ बैठकर खाना खाया, हँसी-मजाक किया और ज़िंदगी की तमाम बातों पर चर्चा हुई—काम, रिश्ते, सपने और चुनौतियाँ। जो महिला रात को सुनसान सड़क पर अकेली हिम्मत से खड़ी थी, उसी के चेहरे पर अब आत्मीयता की मुस्कान थी।
वो बार-बार कह रही थीं—“जय, कल रात अगर तुम मदद न करते तो पता नहीं क्या होता।”
उस रात मैं जब उनके घर से रवाना हुआ, तो अपने भीतर अजीब-सी भावनाओं का मिश्रण लेकर लौटा। रिश्तों का नाम चाहे कुछ भी हो, लेकिन वह मुलाक़ात मेरे दिल पर गहरी छाप छोड़ गई।