
‘गीता, क्या इस बार तुम माघ मेले में शंकरगढ़ जाओगी?’’ पारो ने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘हाँ हाँ, क्यों नहीं। तुम सब भी चल रही हो न?’’ गीता ने जवाब दिया।
‘‘हम सब साथ होंगे,’’ सहेलियों ने एक स्वर में कहा।
कुछ ही दिनों में मेला शुरू हो गया। पारो, गीता और उनकी कई सहेलियाँ गाँव की दूसरी औरतों और कुछ मर्दों के साथ शंकरगढ़ के लिए निकल पड़ीं। गीता पहली बार यह यात्रा कर रही थी, इसलिए उसका उत्साह आकाश छू रहा था।
रास्ते में पारो ने छेड़ा, ‘‘तो बोलो, गीता हमारी शंकर जी से क्या माँगने वाली है?’’
दूसरी सहेली हँसते हुए बोली, ‘‘एक राजकुमार, जो इसे ले उड़े।’’
यह सुनकर गीता शरमा गई, उसके गाल गुलाबी पड़ गए।
वह सचमुच किसी राजकुमारी जैसी लग रही थी। उसकी सुंदरता सबके मन को मोह रही थी। सांझ ढलते-ढलते काफिला शंकरगढ़ पहुँच गया। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग तंबू लगे थे। गीता चारों ओर देखते हुए बोली, ‘‘कितनी सुंदर जगह है, पारो।’’
‘‘हाँ, सचमुच बहुत खूबसूरत,’’ पारो ने हामी भरी।
अगली सुबह अंधेरा रहते ही सब मंदिर पहुँच गए। वहाँ भीषण भीड़ थी। पंडे चढ़ावा समेटने में लगे थे और लोग धक्का-मुक्की से परेशान थे। गहने-नकदी चोरी होने का भी डर था। तभी गीता ने देखा कि एक गठीला पंडा उसे घूर रहा है। उसे बहुत बुरा लगा, लेकिन वह चुप रह गई।

दिन भर सहेलियाँ मेले का आनंद लेती रहीं—झूले, खेल और तमाशे। गीता हर नज़ारा देख लेना चाहती थी, पर थकान की वजह से बाकी सब लौट आईं।
शाम को आरती शुरू हुई। भीड़ से घिरी गीता के चारों ओर कुछ जवान साधु मंडरा रहे थे। तभी अचानक बिजली चली गई। अंधेरे और भगदड़ में गीता का मुँह दबा दिया गया और कोई उसे खींच ले गया। जब रोशनी लौटी, गीता गायब थी। पारो के चीखते ही हड़कंप मच गया।
असल में, गीता को मंदिर से दूर झाड़ियों में ले जाया गया था। वहीं वही पंडा मिला, जिसने दिन में उसे घूरा था। उसने गहने उतारने की कोशिश की। गीता ने चिल्लाया, ‘‘धोखेबाज़! पापी! साधु बनकर औरतों को लूटते हो!’’ लेकिन उसकी चीख सुनने वाला कोई न था। वह दरिंदा और उसके साथी एक-एक कर गीता पर टूट पड़े।
उसी समय नदी किनारे बैठा अमर नामक युवक उसकी आवाज सुनकर दौड़ा। उसने उन नकली साधुओं से भिड़ाई की और उन्हें मार-पीटकर भगा दिया। लोग जुटे तो वे जंगल में भाग निकले। बेहोश गीता को अस्पताल ले जाया गया।
जब होश आया तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी। काकी ने समझाया, ‘‘बेटी, जो बीत गया उसे भूल जाओ।’’ लेकिन गीता तिलमिला उठी, ‘‘ये साधु, ये मंदिर… सब अपवित्र हो चुके हैं। यहाँ इंसानियत बची ही कहाँ है?’’
उसके मन में आत्महत्या का विचार आने लगा और वह नदी में कूदने पहुँची। तभी अमर पीछे से आकर बोला, ‘‘ये क्या कर रही हो?’’
गीता ने कहा, ‘‘अब जीकर भी क्या मिलेगा? कौन मुझे अपनाएगा?’’
अमर ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘मरना कायरों का काम है। तुम्हारी कोई गलती नहीं। तुम्हारा दिल अब भी साफ है। मैं तुम्हारे साथ हूँ और तुमसे विवाह करूँगा।’’
अमर की बातें सुनकर गीता की आँखों में उम्मीद चमक उठी। उसे लगा कि उसकी टूटी ज़िंदगी को फिर से जीने का सहारा और सपना पूरा करने वाला राजकुमार मिल गया है।