
हल्की-हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। सुषमा बरामदे की चौकी पर बैठी चाय की प्याली हाथ में लिए खामोश थी। घर बड़ा था, आँगन में चिड़ियों की चहचहाहट गूँज रही थी, पर सुषमा के मन में एक अजीब-सी खालीपन की ध्वनि चल रही थी।
आज उसे अपनी ज़िंदगी की दहलीज़ याद आ रही थी—वह दहलीज़ जिसे उसने वर्षों पहले साहस के साथ लांघा था।
गाँव की छोटी गलियों से निकलकर जब उसने पढ़ाई के लिए शहर की राह पकड़ी थी, तो कितनी बातें हुई थीं। समाज के ताने, पड़ोस की फुसफुसाहटें और अपने ही घर की हिचकिचाहटें। परंतु सुषमा ने ठान लिया था—”मुझे अपनी दुनिया खुद गढ़नी है।”

यही सोचकर उसने उस दहलीज़ को पार किया और अपने सपनों को आकार दिया। शहर में संघर्ष आसान नहीं था। किराए का कमरा, सीमित साधन और रात-दिन की मेहनत। लेकिन उसी मेहनत ने उसे मज़बूत बनाया। शिक्षा पूरी हुई और आज वह एक सफल अध्यापिका थी।
सपनों की इस यात्रा में उसने बार-बार नई दहलीज़ें देखीं—कभी भय की, कभी असफलता की, कभी अकेलेपन की। पर हर बार जब उसने हिम्मत जुटाकर उन्हें लांघा, तभी आगे का रास्ता आसान हुआ।
आज सितंबर की इस सुबह में, जब वह बरामदे से आँगन की ओर देख रही थी, उसके सामने उसकी पुरानी झिझकें और डर जैसे परछाइयों की तरह खड़े थे। सुषमा मुस्कुराई और मन ही मन बोली—
“ज़िंदगी हमेशा हमें दहलीज़ों के सामने खड़ा करती है। जीत उसी की होती है, जो उन्हें लांघने का साहस रखता है ।”