
कभी न खत्म होने वाली राहें
मुंबई के एक छोटे से मोहल्ले में, शैलजा नाम की एक लड़की अपने माता-पिता के साथ रहती थी। वह बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल और कला में भी रुचि रखती थी। एक दिन, उसे एक बड़े शहर में स्थित एक प्रतिष्ठित कला विद्यालय में दाखिला मिल गया। यह अवसर उसके लिए एक सपने के सच होने जैसा था।
शैलजा ने अपने माता-पिता से अनुमति ली और नए शहर में अकेले रहने का निर्णय लिया। नई शुरुआत के साथ, उसने अपनी कला में निखार लाने की कोशिश की। लेकिन समय के साथ, उसे अकेलापन और घर की याद सताने लगी। वह अक्सर अपने माता-पिता से फोन पर बात करती और घर लौटने की इच्छा जताती।
एक दिन, शैलजा ने अपने माता-पिता से कहा, “मुझे घर वापस आना है, यहाँ अकेलापन बहुत महसूस होता है।” उसके माता-पिता ने उसे समझाया, “बिलकुल, बेटा, जब भी तुम्हें लगे कि तुम तैयार हो, हम तुम्हारे स्वागत के लिए तैयार हैं।”
कुछ समय बाद, शैलजा ने महसूस किया कि उसे अपनी यात्रा को पूरा करना चाहिए। उसने अपने माता-पिता से कहा, “मैं घर वापस आना चाहती हूँ।” उसके माता-पिता ने उसे गले लगाते हुए कहा, “हमेशा तुम्हारा स्वागत है, बेटा।”
घर लौटने के बाद, शैलजा ने महसूस किया कि कभी-कभी अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से दूर जाना जरूरी होता है, लेकिन घर की सुरक्षा और प्यार हमेशा सबसे महत्वपूर्ण होता है।