
कहानी का आरंभ: तिहा गाँव की भयावह किंवदंती
ऋषिका अपने परिवार के साथ नवगांव नामक छोटे पहाड़ी गाँव में रहती थी। गाँव के लोग एक भयानक दुष्ट शक्ति की कथा सुनाते थे, जिसे आगपुंजा कहते थे—एक प्राचीन प्रेत जिसने सात वर्षों से गाँव को त्रस्त कर रखा था। हर साल, आगपुंजा को एक श्रद्धालु बलिदान देना पड़ता था। उस व्यक्ति के घर पर एक नीली कौआ आती, उसकी खिड़की पर बैठती, और अगले दिन उस व्यक्ति की कलाई पर जादुई अंक प्रकट होता: बलिदान का चिन्ह।
अदिति की मासूमियत और आशा
दस वर्षीय अदिति अपनी दादी के साथ रहती थी। उसके माता-पिता आगपुंजा की पहली वार्षा में मर गए थे। अदिति जानती थी कि डर को हराना ज़रूरी है, लेकिन डर उसे छोड़ता नहीं था। दुकान, खेत या घर—हर जगह वह आगपुंजा की कल्पना से घिर जाती। फिर भी उसकी दादी हमेशा कहती, “तुम्हारे भीतर उम्मीद है, अदिति।”
शाप की शुरुआत और बलिदान की प्रथा
सात वर्ष पहले एक दुष्ट जादूगरनी ने गाँव में आकर एक आदेश सुनाया था—अगर उसका पुत्र विवाह में अपमानित हुआ तो उसे शाप देना था। जब पिता जूते ठीक नहीं कर पाए और विवाह समारोह में जूते ना हो पाए, तो जादूगरनी ने पेटा शाप दिया। उसी रात अदिति के पिता गायब हो गए। तब से आगपुंजा ने गाँव को भय में डुबो दिया।
जादुई जूता और लड़ाई
अदिति एक दिन खेत खोदते समय एक चमकता जूता ढूँढती है। उसने जब जूता पहना, तो आश्चर्यजनक बातें होने लगीं—छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी होतीं। भोजन सामने तैरता आता, घास खुद कट जाती, सब काम आसानी से हो जाता। लेकिन उसका मन अकेले नहीं, पूरे गाँव के लिए काम करना चाहता था।
बलिदान का निर्णय और परख
फिर वह दिन आता है जब अदिति का नाम चुना जाता है। उसका दिल डर से भर जाता है, लेकिन दादी का कहना याद आता है—“अगर एक की बलि से सौ का जीवन बच सके, तो डरो नहीं।” वहीँ अदिति समाधान खोजने निकलती है—आगपुंजा से लड़ने की तैयारी में, जूते की शक्ति पर विश्वास करती हुई।
विजय और समरसता
रात होते ही अदिति गाँव वालों को झूठ बोलने वाले, अन्याय करने वालों का सामना करना सिखाती है। साहस और जूते की शक्ति से वह आगपुंजा को परास्त करती है। लेकिन युद्ध के बाद जो प्रवेश करता है—वह उसका पिता है, जो प्रेत के प्रकोप में वो ही हुआ करता था। जूता ही वस्तुतः वह वस्तु थी जो प्रेतत्व को तोड़ सके।
वर्षों बाद, गाँव में प्रेम फिर लौट आता है, भय मिट जाता है। अदिति की बहादुरी की गाथा याद की जाती है, और नवगांव फिर एक बार खुशी और स्नेह का स्थान बन जाता है।