
यह पूरा अंश एक लंबी सामाजिक-राजनीतिक कथा है, जिसमें शनीचरी बाजार, मोचियों का परंपरागत व्यवसाय, किशन गौशाला, स्थानीय राजनीति, सांसद भोलाराम और गांव के सामाजिक टकराव की घटनाओं को चित्रित किया गया है। मैंने इसे बिना किसी नकल के नए ढंग से लिखा है, ताकि मूल भाव बना रहे लेकिन भाषा और संरचना पूरी तरह अलग हो।
शहर की बढ़ती आबादी ने शनीचरी बाजार को सड़क के दोनों ओर समेट लिया है। पहले जहां खाली जगहें थीं, अब चारों तरफ मकान खड़े हो गए हैं। मज़ार से लेकर पुलिस लाइन तक जाने वाली सड़क के किनारे यह साप्ताहिक हाट लगता है। तहसील से ही इसकी शुरुआत मानी जाती है, बल्कि अब तो तहसील भी बाजार के घेरे में ही आ चुकी है।
शनीचरी हाट का एक हिस्सा खासतौर पर देसी चमड़े के जूतों के लिए जाना जाता है। इसी इलाके में किशन गौशाला का दफ्तर भी है। अक्सर गौशाला प्रबंधक और मोचियों के बीच विवाद छिड़ जाता है। मोचियों का तर्क है कि उनके पूर्वजों से ही यह बाजार जूतों और सांस्कृतिक हस्तशिल्प का गढ़ रहा है, मगर अब बाहरी गौसेवक यहां दखल देने लगे हैं। कई बार बात इतनी बिगड़ जाती है कि सांसद के हस्तक्षेप के बिना मामला संभलना मुश्किल हो जाता।

सांसद भोलाराम का इस बाजार से गहरा रिश्ता है। वे खुद दिल्ली में रहते हैं लेकिन हर महीने 25–30 जोड़ी स्थानीय भंदई (छत्तीसगढ़ी सैंडल) मंगवाते हैं। मोची उनका चेहरा नहीं पहचानते क्योंकि सामान लेने उनके लोग ही आते हैं, मगर उनके व्यापार को बड़ा सहारा सिर्फ इसी पैतृक खरीद से मिला है। सांसद ने अपनी निधि से मोची संघ और अन्य गांवों के लिए लाखों रुपये भी दिए हैं, जिससे वे दलित और पिछड़ी जातियों में लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
गौशाला असल में आसपास के व्यापारियों की साझी पहल है, जिन्होंने किसानों से जमीन लेकर इसे स्थापित किया। बाद में स्कूल भी खोला गया, जिससे गांव को ‘किशनशाला’ कहा जाने लगा। सांसद का इसमें भी योगदान रहा, क्योंकि उन्हीं की मौजूदगी और राजनीतिक शक्ति से 20 एकड़ जमीन कब्जाए जाने का मामला स्थानीय स्तर पर दब गया।
लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद गांव में राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को धीरे-धीरे कमल और भगवे झंडे से चुनौती मिल रही थी। सेठ लोग भाजपा को समर्थन देने लगे, जबकि मोची और अन्य मेहनतकश जातियां कांग्रेस की परंपरागत ताकत रहीं।
भोलाराम का जीवन भी असामान्य रहा। खेतिहर परिवार में जन्मे, उन्होंने पढ़ाई अधूरी छोड़ कर 1946 में दिल्ली का रुख किया। वहीं पत्रकार बने और गांधीजी की अंतिम प्रार्थना सभा तक कवर करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनके समर्थक तो यह दावा भी करते हैं कि गांधीजी की शहादत के वक्त वे घटनास्थल पर मौजूद थे। उनकी पत्रकारिता ने उन्हें इतना नाम दिया कि इंदिरा गांधी ने उन्हें इस इलाके से सांसद बना दिया। तब से वे पांच बार लगातार चुनाव जीतते रहे।
हाल ही में शनीचरी बाजार में हलचल मच गई जब भोलाराम अचानक पहुंच गए। उन्होंने एक स्थानीय मोची चैतराम से एक सौ जोड़ी भंदई बनाने का ऑर्डर दिया। यह खबर सुनते ही गांवभर के मोची उत्साहित हो गए, मगर इसी के साथ गौशाला की जमीन कब्जाने का मुद्दा भी सामने आ गया। मोचियों ने सांसद से चारागाह की जमीन छुड़ाने की मांग कर दी।
उधर सेठ पक्ष इससे नाराज़ हो गया। उन्होंने गांव में बैठक बुलाई और मामला बिगड़ता चला गया। बाबरी मस्जिद से लौटे नौजवान सुंदरलाल और मोचियों के बीच तीखी कहासुनी हुई, जो अंततः हिंसा में बदल गई। लाठी-डंडों से झगड़ा हुआ और कई मोची घायल हो गए।
इस विवाद ने सांसद को भी असमंजस में डाल दिया। वे मोचियों के भी हमदर्द दिखना चाहते थे और सेठों को भी नाराज़ नहीं कर सकते थे। उन्होंने घायल मोचियों को न्याय का भरोसा दिलाया, लेकिन गांववालों का गुस्सा शांत नहीं हुआ।
एक बुजुर्ग ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अब वे न भोले हैं न भाले। कभी जहां निर्णायक कदम उठाना चाहिए वहां नरमी दिखाते हैं, और जहां शांति चाहिए वहां कठोर हो जाते हैं। गांव की राजनीति अब दो रास्तों में बंटी हुई है—एक जिंदा गाय की पूजा पर और दूसरी मरी गाय की चमड़ी पर। लोगों की मजबूरी यही है कि उन्हें हर बार दो गलतियों में से कम गलत को चुनना पड़ता है, और इसी के चलते वे हमेशा हार जाते हैं।